रविवार, 21 अगस्त 2016

मुद्दत बीती, अब तो एक जमाना हुआ
कोई अपना न सका, कोई बेगाना हुआ
कबूतर ने भी मुंडेर पर छोड दिया आना
वक्त ने तेवर बदल दिए या सयाना हुआ
उसकी तस्वीर तो पुर्जे-पुर्जे हो चुकी अब
एक खत बचा रखा है जो न पुराना हुआ
बाद जाने के उसके फिर कोई आया नहीं
हां, कई मर्तबा गम का आना-जाना हुआ
आज ख्वाब ने आधी रात ही खोल दी आंखें
सोचा कि शख्स तो था जाना-पहचाना हुआ
हर कोई आज कल पहचान तलाशता है
हो कोई भी, हिंदू-मुसलमान तलाशता है
जमीं पर उतराते तो उसने भी न सोचा हो
ऊपर बैठा है जो वो तो इंसान तराशता है
लड मरे-कट मरे, कतरा-कतरा खून बहा
बहरा हाकिम तो अब निशान तलाशता है
पत्‍थर सी हो गई हैं उस बुजुर्ग की आंखें
जो सामान नहीं, जले अरमान तलाशता है
सियासत से अब हम तंग आ गए दोस्‍तों
जख्‍म देके शिगूफा-ए-एहसान तलाशता है
रफ्ता-रफ्ता हमारे जख्‍म नासूर बनते गए
जो-जो गुनाहगार थे सब बेकसूर बनते गए
समझ आते-आते जमाना बीतने को बेताब
न जाने क्‍यों अब तक हम बेशऊर बनते रहे
औरों के ख्‍वाब रंगने का हमे का जुनून रहा
अपने सपनों की फिक्र नहीं, बेनूर बनते रहे
जिन्‍होंने अपनों को तवज्‍जों न दी उम्र भर
गैरों के हिमायती बन वो मशहूर बनते रहे
उसका पसीना मेरे पसीने से जुदा न था
मेरा ख्‍वाब आखों में उसकी चुभा न था
खून का रंग भी एक था दोनों का मगर
माथे पे किसी हिंदू-मुस्‍लिम गुदा न था
जाने क्‍या हुआ हवा लौट के आने लगी
अब तलक ऐसा कभी कुछ हुआ न था
सियासत चाहे जो समझे, हमे मालूम है
वो हाकिम तो जरूर था, पर खुदा न था

तुझे भुलाऊं तो बता भुलाऊं कैसे ?
गर तुझे याद आऊं तो आऊं कैसे?
खामोशी से गया तू, एकदम चुप
कुछ सुनता-कहता, बताऊं कैसे?
उम्र थी न तेरा वक्‍त था जाने का
खुदा तू ही बता उसे बुलाऊं कैसे?
तेरे-मेरे बीच में फासला बन गया
फासला ये अजीब है मिटाऊं कैसे?
तुझे रुख्‍सत भी नहीं कर सका मैं
अपना यह गुनाह मैं छिपाऊं कैसे?
तू नजीर बन गया सबकी खातिर
तुझे आज मैं खोज के लाऊं कैसे?
कतरा हूं, समंदर में सिमट जाने दो
संभालो न मुझे, आज मिट जाने दो
रोज-रोज किस्‍सा बनूं ये गंवारा नहीं
बात जब आई तो बस निपट जाने दो
कई बाजी हार चुका मैं जज्‍बातों की
इकबार और सही, मुहरे पिट जाने दो
जिंदगी से अक्‍सर लोग लिपटते देखे
छोडो, देखें तो मौत से लिपट जाने दो
किरदार तो कभी हकदार बदल जाते हैं
वक्‍त बदला कि कुछ यार बदल जाते हैं
अच्‍छा हुआ तो सब करीब-करीब से होते
गर न हुआ तो उनके मयार बदल जाते हैं
रत्‍तीभर भी गम न करुं उनके बदलने का
सोचता हूं के जाने क्‍यूं बेकार बदल जाते हैं
रह-रहकर चंद यादें आंखों में दे रही दस्‍तक
कैसे वक्‍त के बदलते ही करार बदल जाते हैं
फिर भी यकीं है लौटके आएगा वो एक दिन
जरा-सा वक्‍त क्‍या बदला, वार बदल जाते हैं
शाकी बदली-बदली, मयखाना बदला-सा
दिलकशी बदली या तो दीवाना बदला-सा
चाहकर भी आज रंग न दिखा पाई मुझपे
या मैं बदला, या तो फिर पैमाना बदल-सा
मुझे ताज्‍जुब है तो बस इतना सा है दोस्‍तों
मैं बदल गया या लगे ये जमाना बदला-सा
अब रास्‍ते बदलके मुझे अच्‍छा नहीं लगता
मंजिल वही है थोडा आना-जाना बदला-सा
जमाना बचाना चाहता है, वो जलाना चाहता है
उसकी हद ये है जो अब भी मुझे पाना चाहता है
उसकी खुशी वाजिब, मेरी उदासी भी बेसबब नहीं
जाने क्‍यूं ये वक्‍त भी मुझे ही आजमाना चाहता है
गुजरा वक्‍त भी कभी आया है वापस लौटकर कहीं
कोई है जो कहता है वो अब वापस आना चाहता है
अब तक सुनी और आगे भी सुनता रहूं जमाने की
है कोई इर्द-गिर्द सुने जो दीवाना सुनाना चाहता है
अल्‍फाजों में उसके कुछ तो पुरअसर बात थी जो
मुझे देखकर जाने वो क्‍या बुदबुदाना चाहता है
यादों में मेरी कुछ चेहरों का बसेरा है
चंद अल्‍फाज हैं, रोशनी है, अंधेरा है
दूर तलक जाती सोच की सडक पर
दिख रहा सपनों का उगता सवेरा है
ये ख्‍वाब तो मेरे पास रहें सुबह तक
शब पर रहा कहां, किसका पहरा है
रोक लूंगा जिद करके इन लम्‍हों को
कल का ये सवेरा तो मेरा है, तेरा है