रविवार, 21 अगस्त 2016

"पिता"
पिता, टहनी है, पत्‍ती है, फल है
पिता हैं तो जीवन ये सफल है
पिता, नीम है, पीपल है, बरगद है
जिसकी छाया में जीवन गदगद है
पिता, जीवन है, सांस है, आत्‍मा है
पिता, चारों धाम है, परमात्‍मा है
पिता, उपकार है, उपासना है, पुण्‍य है
पिता, गलतियों से गुणा होता शून्‍य है
पिता, ब्रह्मा है, विष्‍णु है, महेश है
पिता, मीठी भाषा है, सादा भेष है
पिता, वेद है, पुराण है, मंत्रों का जाप है
जिंदगी की वेदी में संस्‍कारों का ताप है
पिता, गीत है, संगीत है, राग है
पिता, सबके भीतर जलती आग है
पिता, वाणी है, पराक्रम है, चेतना है
पिता, इन शब्‍दों में बंधी संवेदना है
पिता, योग है, क्रिया है, ध्‍यान है
पिता, जीवन में सत्‍य का ज्ञान है
पिता, कुल है, गोत्र है, पहचान है
पिता, धरा पर नभ के भगवान है
पिता, क्रोध है, डांट है, फटकार है
पत्‍थर से मूर्ति बनाता शिल्‍पकार है
पिता, सत्‍युग है, द्वापर है, त्रेता है
पिता, कुछ कर गुजरने के प्रणेता है
पिता, मंदिर, मस्‍जिद, गिरिजा, गुरुद्वारा है
पिता, आकाश में टिमटिमाता तारा है
पिता, आरंभ है, केंद्र है, अंत है
पिता, सही राह दिखाता संत है
कबीर के दोहे, तुलसी की चौपाई, रसखान के गीत है
पिता, जीवन में हर हार के बाद मिलने वाली जीत है
पिता, भक्‍ति है, भावना है, आस्‍था है
पिता, मंजिल पर पहुंचाता रास्‍ता है

उदासियाँ जितनी भी थी सब जब्त हो गयी
जब से तबियत मेरी नरम से सख्त हो गयी
फकीरी के दिन हों या फाकाकशी की रात
लगे है मानों जिंदगी ताज ओ तख़्त हो गयी
ख्वाहिशों ने झिंझोड़कर रख दिया था मुझे
याददाश्त ज़रूर बाअदब, बावक्त हो गयी
इतने ज़ख्म अपने सीने में छुपाये रखे मैंने
हंसी देख बरसों की अदावत पस्त हो गयी

शनिवार, 20 अगस्त 2016


कलम रही खामोश, शब्‍द सारे टूट गए
कुछ से छूटा मैं तो कुछ मुझसे छूट गए
तेरी बात तो तू जाने, मैं बस अपनी जानूं
अंदर से जब-जब सिमटा, बाहर सारे रुठ गए
तारे, जुगनू, चांद, चकौर, रात के साथी हैं सारे
इन आंखों से सारे नजारे, सारे मंजर रुठ गए
मेरी सोचो तब तुम जानो, क्‍यों हूं मै खामोश
मेरी छोडो, तुम देखो, तुमको अपने लूट गए

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

राम जी ! देखो रावण यहां जिंदा है

राम जी ! देखो रावण यहां जिंदा है
भ्रष्‍टाचार में सना, न वो शर्मिंदा है
नेता को रोल मिला है कुंभकर्ण का
लखन को खोजती फिरती सूपर्नखा
सीता को लुभाने मारीच बन आ रहे
आह और गालियां नीच बन खा रहे
साधु के वेश में भिक्षा मांगी जा रही
फिर लक्ष्‍मण रेखा है लांघी जा रही
बच्‍चे पूछते कि राम-लखन कौन थे
बाबा जो हमें बताते थे, वह मौन थे
कहें वो क्‍या करें, हालात ऐसे बन पडे
विभिषण भी यहां साथ रावण के खडे
देश में भूचाल है, चरित्र है न चाल है
मैंगो पीपुल भूखा, नेता मालामाल है
एक बार आओ फिर रावण वध करने
स्‍याह अंधेरे को रोशन, जगमग करने
बुराई पर हो फिर अच्‍छाई की विजय
है कामना यही, राम तेरी जय हो जय

विजय दशमी की शुभकामनाएं....

कागजों में एक बार फिर अच्‍छाई से बुराई हारेगी
पर दुनिया अपने अंदर के रावण को कब मारेगी ?

सुबह, दोपहर, शाम ओ रात में रहो

सुबह, दोपहर, शाम ओ रात में रहो
हर वक्‍त, तुम मेरी हर बात में रहो
वक्‍त-बेवक्‍त ये आंधियां डराती हैं
हर घडी, हर पल मेरे साथ में रहो
बिखर भी जाऊं तो कोई गम नहीं
संभलू गर जेहन ओ जात में रहो
बिजलियां मुझे डराएंगी कब तलक
बस सिलसिला-ए-मुलाकात में रहो

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

सूरज से मैंने उजाला उधार...

सूरज से मैंने उजाला उधार मांगा था
शबनमी रातों से थोडा खुमार मांगा था
गुस्‍ताखी समझते हो तो समझो बेशक
अपने यार से मैंने अपना यार मांगा था
ये दीवार अब छतों से बाते करने लगी
दोनों में थोडा फासला, मयार मांगा था
मुद्दत से नहीं मिले जाने क्‍या बात है
उससे बस दो पल का दीदार मांगा था
तूने नहीं दिया वक्‍त ये तेरी मर्जी खैर
जब भी मिले हमने हर बार मांगा था
मेरे हिस्‍से में तेरी नफरत थी बेवजह
कभी अपने हिस्‍से का प्‍यार मांगा था
यकीं करके जिंदगी जहन्‍नुम कर ली
मैंने बस जरा-सा एतबार मांगा था

मयार-ए-गम...

मयार-ए-गम भुलाना चाहता है
याद करना, याद आना चाहता है
शिद्दत-ए-तश्‍नगी में खामोश लब
उसी के हाथों से पैमाना चाहता है
दोस्‍त था कभी, जो हुआ दुश्‍मन
फिर उसे ही आजमाना चाहता है
यकीनन लौटकर आ नहीं सकता
फिर भी गुजारा जमाना चाहता है
ये मौसम बदमिजाज सा हो चला
रंग-ए-बाहर आशिकाना चाहता है
मेरा दिल भी बच्‍चों सा मचलता है
बुजुर्गों की तरह बहकाना चाहता है
इस जिंदगी से अब दिल भर गया
जीने का कोई नया बहाना चाहता है
मालूम है पतझड आ गया लेकिन
दिल है कि मौसम सुहाना चाहता है
मुहब्‍बत में है शिद्दत तो याद रखना
बहार आएंगी, गर बुलाना चाहता है
बातों में कशिश है तो याद आएगा
वो चाहे कितना भी भुलाना चाहता है

चल, मैं पागल हूं...

चल, मैं पागल हूं, तू तो होशियार है
बता, इस खता का कौन जिम्‍मेदार है
कभी तो आओ, पास बैठो, बात करो
वक्‍त निकल जाएगा, तेज रफ्तार है
बिछडके तेरा हाल भी मुझसे जुदा नहीं
गमजदा हूं, खुशी कहां तेरी हमवार है
हरबार तुझपे यकीं करके मिला धोखा
फिर भी यही कहा, एतबार है, एतबार है
तू तोडता रहा हमेशा ख्‍वाब औरों के
कोई तो मेरे सपनों का भी पहरेदार है

जर्रा हूं मैं...

जर्रा हूं मैं, मेरा क्‍या असर होगा
जिक्र तवील, नाम मुख्‍तसर होगा
हर मील के पत्‍थर से पूछता हूं
और कितना लंबा सफर होगा
यही बेकशी रही तो एक दिन
दोस्‍तों के हाथ में पत्‍थर होगा
तुम समझते हो तो जर्रेनवाजी है
वो समझते हैं के सूखा शजर होगा