रविवार, 21 अगस्त 2016
जमाना
बचाना चाहता है, वो जलाना चाहता है
उसकी हद ये है जो अब भी मुझे पाना चाहता है
उसकी खुशी वाजिब, मेरी उदासी भी बेसबब नहीं
जाने क्यूं ये वक्त भी मुझे ही आजमाना चाहता है
गुजरा वक्त भी कभी आया है वापस लौटकर कहीं
कोई है जो कहता है वो अब वापस आना चाहता है
अब तक सुनी और आगे भी सुनता रहूं जमाने की
है कोई इर्द-गिर्द सुने जो दीवाना सुनाना चाहता है
अल्फाजों में उसके कुछ तो पुरअसर बात थी जो
मुझे देखकर जाने वो क्या बुदबुदाना चाहता है
उसकी हद ये है जो अब भी मुझे पाना चाहता है
उसकी खुशी वाजिब, मेरी उदासी भी बेसबब नहीं
जाने क्यूं ये वक्त भी मुझे ही आजमाना चाहता है
गुजरा वक्त भी कभी आया है वापस लौटकर कहीं
कोई है जो कहता है वो अब वापस आना चाहता है
अब तक सुनी और आगे भी सुनता रहूं जमाने की
है कोई इर्द-गिर्द सुने जो दीवाना सुनाना चाहता है
अल्फाजों में उसके कुछ तो पुरअसर बात थी जो
मुझे देखकर जाने वो क्या बुदबुदाना चाहता है
आज मिला फिर वो अजनबी की
तरह
बहता रहा मैं भी खामोश नदी की तरह
चुपचाप देखता रहा मुझे बस किनारे से
एक-एक लम्हा लगा कई सदी की तरह
मैं खाक हूँ चाह कर भी छू नहीं सकता
वो
ऊँचा है आसमां की बुलंदी की तरह
शिकवा-शिकायत
भी होती रही बहुत
मिले
भी कई बार हम महजबीं की तरह
अब तोड़
दो जो तोड़ सको ये हदें सारी
जिंदगी
जियें तो जियें बंदगी की तरह
भूलकर
मुझे चैन से रह पाओ तो अच्छा है
जाते-जाते यादें भी ले जाओ तो अच्छा है
जाने वाले को यूँ तो रोकना मुश्किल बहुत
मान लो बात मेरी लौट आओ तो अच्छा है
यकीं खुद पर है, बहुत एतबार तुम पर भी
मान लो इतना भी न झुकाओ तो अच्छा है
खता करके भी चलो खतावार तुम नहीं हो
इस बात को इतना न बढाओ तो अच्छा है
घनघोर अँधेरों में चलते जा रहे हैं तुम-हम
चिराग इक मिलकर जलाओ तो अच्छा है
जाते-जाते यादें भी ले जाओ तो अच्छा है
जाने वाले को यूँ तो रोकना मुश्किल बहुत
मान लो बात मेरी लौट आओ तो अच्छा है
यकीं खुद पर है, बहुत एतबार तुम पर भी
मान लो इतना भी न झुकाओ तो अच्छा है
खता करके भी चलो खतावार तुम नहीं हो
इस बात को इतना न बढाओ तो अच्छा है
घनघोर अँधेरों में चलते जा रहे हैं तुम-हम
चिराग इक मिलकर जलाओ तो अच्छा है
ये
स्याह रात, सन्नाटा घना, काली घटाएं हैं
खौफ नहीं ज़रा, साथ चलती ढेरों दुआएं हैं
जा अब डराने का कोई नया जरिया ढूंढ ले
ये फन पुराने हुए, ये किस्से सुने-सुनाये हैं
रिसते जख्मों को ये हवा छू तक न पाएगी
मंतर किसी फकीर ने हमपे भी बुदबुदाए हैं
इम्तेहान जिंदगी के पास कर गए हर मर्तबा
अदालत में उसकी सिर फिर भी झुकाए हैं
मेरे इखलाक मांगने की इज़ाज़त नहीं देते
उसने एहसान मुझपे कई अता फरमाए हैं
अब इससे बढ़कर इनाम और क्या होगा
दुश्मन कहें तेरे शेर हमने भी गुनगुनाये हैं
खौफ नहीं ज़रा, साथ चलती ढेरों दुआएं हैं
जा अब डराने का कोई नया जरिया ढूंढ ले
ये फन पुराने हुए, ये किस्से सुने-सुनाये हैं
रिसते जख्मों को ये हवा छू तक न पाएगी
मंतर किसी फकीर ने हमपे भी बुदबुदाए हैं
इम्तेहान जिंदगी के पास कर गए हर मर्तबा
अदालत में उसकी सिर फिर भी झुकाए हैं
मेरे इखलाक मांगने की इज़ाज़त नहीं देते
उसने एहसान मुझपे कई अता फरमाए हैं
अब इससे बढ़कर इनाम और क्या होगा
दुश्मन कहें तेरे शेर हमने भी गुनगुनाये हैं
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