रविवार, 21 अगस्त 2016

शाकी बदली-बदली, मयखाना बदला-सा
दिलकशी बदली या तो दीवाना बदला-सा
चाहकर भी आज रंग न दिखा पाई मुझपे
या मैं बदला, या तो फिर पैमाना बदल-सा
मुझे ताज्‍जुब है तो बस इतना सा है दोस्‍तों
मैं बदल गया या लगे ये जमाना बदला-सा
अब रास्‍ते बदलके मुझे अच्‍छा नहीं लगता
मंजिल वही है थोडा आना-जाना बदला-सा
जमाना बचाना चाहता है, वो जलाना चाहता है
उसकी हद ये है जो अब भी मुझे पाना चाहता है
उसकी खुशी वाजिब, मेरी उदासी भी बेसबब नहीं
जाने क्‍यूं ये वक्‍त भी मुझे ही आजमाना चाहता है
गुजरा वक्‍त भी कभी आया है वापस लौटकर कहीं
कोई है जो कहता है वो अब वापस आना चाहता है
अब तक सुनी और आगे भी सुनता रहूं जमाने की
है कोई इर्द-गिर्द सुने जो दीवाना सुनाना चाहता है
अल्‍फाजों में उसके कुछ तो पुरअसर बात थी जो
मुझे देखकर जाने वो क्‍या बुदबुदाना चाहता है
यादों में मेरी कुछ चेहरों का बसेरा है
चंद अल्‍फाज हैं, रोशनी है, अंधेरा है
दूर तलक जाती सोच की सडक पर
दिख रहा सपनों का उगता सवेरा है
ये ख्‍वाब तो मेरे पास रहें सुबह तक
शब पर रहा कहां, किसका पहरा है
रोक लूंगा जिद करके इन लम्‍हों को
कल का ये सवेरा तो मेरा है, तेरा है
काश ! मेरे शहर का हर शख्स इन्सान हो जाए
सोचो ! जिंदगी कैसी खुशनुमा, आसान हो जाए
हर रात साथ अँधेरे की चादर लाती तो ज़रूर है
उजाला ढूंढ लो के साथ आरती, अजान हो जाए
आज मिला फिर वो अजनबी की तरह
बहता रहा मैं भी खामोश नदी की तरह
चुपचाप देखता रहा मुझे बस किनारे से
एक-एक लम्हा लगा कई सदी की तरह
मैं खाक हूँ चाह कर भी छू नहीं सकता
वो ऊँचा है आसमां की बुलंदी की तरह
शिकवा-शिकायत भी होती रही बहुत
मिले भी कई बार हम महजबीं की तरह
अब तोड़ दो जो तोड़ सको ये हदें सारी
जिंदगी जियें तो जियें बंदगी की तरह
अब भूख नहीं लगती प्यास नहीं लगती
उसके लौटने की कोई आस नहीं लगती
भूलकर मुझे चैन से रह पाओ तो अच्छा है
जाते-जाते यादें भी ले जाओ तो अच्छा है
जाने वाले को यूँ तो रोकना मुश्किल बहुत
मान लो बात मेरी लौट आओ तो अच्छा है
यकीं खुद पर है, बहुत एतबार तुम पर भी
मान लो इतना भी न झुकाओ तो अच्छा है
खता करके भी चलो खतावार तुम नहीं हो
इस बात को इतना न बढाओ तो अच्छा है
घनघोर अँधेरों में चलते जा रहे हैं तुम-हम
चिराग इक मिलकर जलाओ तो अच्छा है
आज फिर किसी भूले को याद करते हैं
ख्यालों को अब से हम आज़ाद करते है
कब तलक दफनायें रहें दिल में ज़ज्बात
हसरतों की कब्र पर शमां आबाद करते हैं
मुझसे तो अब और कुछ सहा नहीं जाता
एकबार फिर अमन की फरियाद करते हैं
तबाह कर डालेगा नफरत का ये ज़लज़ला
चलो मिलकर मोहब्बत जिंदाबाद करते हैं
इस जहाँ से लेकर उस जहाँ तक
परखूंगा तुझे जुल्म की इन्तहा तक
ये स्याह रात, सन्नाटा घना, काली घटाएं हैं
खौफ नहीं ज़रा, साथ चलती ढेरों दुआएं हैं
जा अब डराने का कोई नया जरिया ढूंढ ले
ये फन पुराने हुए, ये किस्से सुने-सुनाये हैं
रिसते जख्मों को ये हवा छू तक न पाएगी
मंतर किसी फकीर ने हमपे भी बुदबुदाए हैं
इम्तेहान जिंदगी के पास कर गए हर मर्तबा
अदालत में उसकी सिर फिर भी झुकाए हैं
मेरे इखलाक मांगने की इज़ाज़त नहीं देते
उसने एहसान मुझपे कई अता फरमाए हैं
अब इससे बढ़कर इनाम और क्या होगा
दुश्मन कहें तेरे शेर हमने भी गुनगुनाये हैं