रविवार, 21 अगस्त 2016

भूलकर मुझे चैन से रह पाओ तो अच्छा है
जाते-जाते यादें भी ले जाओ तो अच्छा है
जाने वाले को यूँ तो रोकना मुश्किल बहुत
मान लो बात मेरी लौट आओ तो अच्छा है
यकीं खुद पर है, बहुत एतबार तुम पर भी
मान लो इतना भी न झुकाओ तो अच्छा है
खता करके भी चलो खतावार तुम नहीं हो
इस बात को इतना न बढाओ तो अच्छा है
घनघोर अँधेरों में चलते जा रहे हैं तुम-हम
चिराग इक मिलकर जलाओ तो अच्छा है
आज फिर किसी भूले को याद करते हैं
ख्यालों को अब से हम आज़ाद करते है
कब तलक दफनायें रहें दिल में ज़ज्बात
हसरतों की कब्र पर शमां आबाद करते हैं
मुझसे तो अब और कुछ सहा नहीं जाता
एकबार फिर अमन की फरियाद करते हैं
तबाह कर डालेगा नफरत का ये ज़लज़ला
चलो मिलकर मोहब्बत जिंदाबाद करते हैं
इस जहाँ से लेकर उस जहाँ तक
परखूंगा तुझे जुल्म की इन्तहा तक
ये स्याह रात, सन्नाटा घना, काली घटाएं हैं
खौफ नहीं ज़रा, साथ चलती ढेरों दुआएं हैं
जा अब डराने का कोई नया जरिया ढूंढ ले
ये फन पुराने हुए, ये किस्से सुने-सुनाये हैं
रिसते जख्मों को ये हवा छू तक न पाएगी
मंतर किसी फकीर ने हमपे भी बुदबुदाए हैं
इम्तेहान जिंदगी के पास कर गए हर मर्तबा
अदालत में उसकी सिर फिर भी झुकाए हैं
मेरे इखलाक मांगने की इज़ाज़त नहीं देते
उसने एहसान मुझपे कई अता फरमाए हैं
अब इससे बढ़कर इनाम और क्या होगा
दुश्मन कहें तेरे शेर हमने भी गुनगुनाये हैं
"पिता"
पिता, टहनी है, पत्‍ती है, फल है
पिता हैं तो जीवन ये सफल है
पिता, नीम है, पीपल है, बरगद है
जिसकी छाया में जीवन गदगद है
पिता, जीवन है, सांस है, आत्‍मा है
पिता, चारों धाम है, परमात्‍मा है
पिता, उपकार है, उपासना है, पुण्‍य है
पिता, गलतियों से गुणा होता शून्‍य है
पिता, ब्रह्मा है, विष्‍णु है, महेश है
पिता, मीठी भाषा है, सादा भेष है
पिता, वेद है, पुराण है, मंत्रों का जाप है
जिंदगी की वेदी में संस्‍कारों का ताप है
पिता, गीत है, संगीत है, राग है
पिता, सबके भीतर जलती आग है
पिता, वाणी है, पराक्रम है, चेतना है
पिता, इन शब्‍दों में बंधी संवेदना है
पिता, योग है, क्रिया है, ध्‍यान है
पिता, जीवन में सत्‍य का ज्ञान है
पिता, कुल है, गोत्र है, पहचान है
पिता, धरा पर नभ के भगवान है
पिता, क्रोध है, डांट है, फटकार है
पत्‍थर से मूर्ति बनाता शिल्‍पकार है
पिता, सत्‍युग है, द्वापर है, त्रेता है
पिता, कुछ कर गुजरने के प्रणेता है
पिता, मंदिर, मस्‍जिद, गिरिजा, गुरुद्वारा है
पिता, आकाश में टिमटिमाता तारा है
पिता, आरंभ है, केंद्र है, अंत है
पिता, सही राह दिखाता संत है
कबीर के दोहे, तुलसी की चौपाई, रसखान के गीत है
पिता, जीवन में हर हार के बाद मिलने वाली जीत है
पिता, भक्‍ति है, भावना है, आस्‍था है
पिता, मंजिल पर पहुंचाता रास्‍ता है

उदासियाँ जितनी भी थी सब जब्त हो गयी
जब से तबियत मेरी नरम से सख्त हो गयी
फकीरी के दिन हों या फाकाकशी की रात
लगे है मानों जिंदगी ताज ओ तख़्त हो गयी
ख्वाहिशों ने झिंझोड़कर रख दिया था मुझे
याददाश्त ज़रूर बाअदब, बावक्त हो गयी
इतने ज़ख्म अपने सीने में छुपाये रखे मैंने
हंसी देख बरसों की अदावत पस्त हो गयी

शनिवार, 20 अगस्त 2016


कलम रही खामोश, शब्‍द सारे टूट गए
कुछ से छूटा मैं तो कुछ मुझसे छूट गए
तेरी बात तो तू जाने, मैं बस अपनी जानूं
अंदर से जब-जब सिमटा, बाहर सारे रुठ गए
तारे, जुगनू, चांद, चकौर, रात के साथी हैं सारे
इन आंखों से सारे नजारे, सारे मंजर रुठ गए
मेरी सोचो तब तुम जानो, क्‍यों हूं मै खामोश
मेरी छोडो, तुम देखो, तुमको अपने लूट गए

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

राम जी ! देखो रावण यहां जिंदा है

राम जी ! देखो रावण यहां जिंदा है
भ्रष्‍टाचार में सना, न वो शर्मिंदा है
नेता को रोल मिला है कुंभकर्ण का
लखन को खोजती फिरती सूपर्नखा
सीता को लुभाने मारीच बन आ रहे
आह और गालियां नीच बन खा रहे
साधु के वेश में भिक्षा मांगी जा रही
फिर लक्ष्‍मण रेखा है लांघी जा रही
बच्‍चे पूछते कि राम-लखन कौन थे
बाबा जो हमें बताते थे, वह मौन थे
कहें वो क्‍या करें, हालात ऐसे बन पडे
विभिषण भी यहां साथ रावण के खडे
देश में भूचाल है, चरित्र है न चाल है
मैंगो पीपुल भूखा, नेता मालामाल है
एक बार आओ फिर रावण वध करने
स्‍याह अंधेरे को रोशन, जगमग करने
बुराई पर हो फिर अच्‍छाई की विजय
है कामना यही, राम तेरी जय हो जय

विजय दशमी की शुभकामनाएं....

कागजों में एक बार फिर अच्‍छाई से बुराई हारेगी
पर दुनिया अपने अंदर के रावण को कब मारेगी ?

सुबह, दोपहर, शाम ओ रात में रहो

सुबह, दोपहर, शाम ओ रात में रहो
हर वक्‍त, तुम मेरी हर बात में रहो
वक्‍त-बेवक्‍त ये आंधियां डराती हैं
हर घडी, हर पल मेरे साथ में रहो
बिखर भी जाऊं तो कोई गम नहीं
संभलू गर जेहन ओ जात में रहो
बिजलियां मुझे डराएंगी कब तलक
बस सिलसिला-ए-मुलाकात में रहो